नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बेटी को माता-पिता से शिक्षा का खर्च लेने का वैध अधिकार है। उन्हें बेटी धन देने को बाध्य किया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी वैवाहिक विवाद के मामले में की। इसमें अलग रह रहे दंपती की बेटी ने मां को दिए जा रहे गुजारा भत्ते के एक हिस्से के रूप में अपने पिता की ओर से उसकी पढ़ाई के लिए दिए 43 लाख रुपये लेने से इन्कार कर दिया था। दंपती की बेटी आयरलैंड में पढ़ाई कर रही है।
पीठ ने कहा, बेटी होने के नाते उसे माता-पिता से शिक्षा खर्च पाने का अपरिहार्य व कानूनी हक है। माता पिता को उनके वित्तीय संसाधनों की सीमा में राशि देने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
सक्षम पिता से धन लेना हक
पीठ ने कहा, दंपती की बेटी ने अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए राशि लेने से मना कर दिया और पिता को पैसे वापस लेने को कहा था, पर उन्होंने इन्कार कर दिया था। पीठ ने कहा, बेटी कानूनी तौर पर राशि की हकदार है। कहा जाता है कि पिता ने राशि अपने पास ही रखी और बिना किसी वाजिब वजह के खर्च कर दी। इससे संकेत मिलता है कि वह बेटी की पढ़ाई के लिए वित्तीय मदद करने में सक्षम थे। पीठ ने कहा, दंपती 26 वर्षों से अलग रह रहे हैं। इसलिए आपसी सहमति से तलाक का आदेश न देने का कोई कारण नजर नहीं आता। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए हम सहमति से तलाक का आदेश देकर विवाह विच्छेद करते हैं।
कोर्ट पहुंची थी मां
इस मामले में मां ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें पारिवारिक न्यायालय की ओर से तय मासिक भरण-पोषण को 5,000 रुपये से बढ़ाकर सिर्फ 7,000 रुपये किया गया था। पत्नी ने दावा किया था, उसके पति का वेतन 80 हजार रुपये प्रतिमाह से अधिक है। इसलिए पति की मासिक आय व जीवनस्तर को देखते हुए वह भरण- पोषण की हकदार है। बेटी मां के संरक्षण में रही। कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा था, जहां पति ने 73 लाख रुपये देने पर सहमति जताई थी।












