दीपक द्विवेदी / पार्थ नादपारा
गांधीनगर। विकसित भारत अभियान के पुरोधा और नए भारत के शिल्पकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंततः देश भर के राजभवनों को लोकभवनों की कार्यशैली में परिवर्तित कर ही दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस फैसले से अब पुराने राजभवनों में ‘रेस्ट करने’ की दशकों पुरानी परम्परा खत्म हो गई। नए ‘लोकभवनों’ की नई संस्कृति में अब ‘लोकभवन’ को लोकहित के लिए सदैव सक्रिय भूमिका में रहना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रतिपादित ‘लोकभवनों’ की इस नई कार्य संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए गुजरात के राज्यपाल माननीय आचार्य देवव्रत ने देश के लोकभवनों की कार्यशैली का एक नया प्रोटोकॉल तैयार कर दिया है। राज्यपाल आचार्य देवव्रत की राज्य में शुरू की गई इस अनूठी पहल ने गुजरात में शासन की कार्यशैली को अंतिम व्यक्ति के सर्वांगीण विकास पर फोकस करते हुए एक नई कार्यशैली स्थापित की है।
“हर सप्ताह-एक तहसील” कार्यक्रम के तहत राज्यपाल आचार्य देवव्रत प्रत्येक सप्ताह गांवों में जाकर लोक संवाद करके वहीं रात्रि भोजन, वार्ता और विश्राम के साथ राज्यपाल पद की सादगी, समरसता, सहिष्णुता और ग्रामीणों के सम्यक विकास में अपने सक्रिय और सार्थक योगदान का अद्भुत संदेश दे रहे हैं।
सच तो यह है कि राज्यपाल देवव्रत की पहल “आओ चलें गांव की ओर – हर सप्ताह एक तहसील” अब गुजरात में एक प्रभावशाली जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। राज्यपाल देवव्रत का यह असाधारण अभियान न केवल सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा रहा है बल्कि समाज में जागरूकता और उनकी सहभागिता को भी बढ़ा रहा है।
राज्यपाल देवव्रत की यह मुहिम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत अभियान की मजबूती का एक बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ भी साबित हो रही है। राज्यपाल देवव्रत का ग्रामीण भारत के सर्वांगीण विकास का यह प्रेरक अभियान यूनाइटेड नेशंस के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) की नए भारत में नई सफलता का एक कीर्तिमान भी स्थापित कर रहा है।
उल्लेखनीय है कि राज्यपाल देवव्रत का स्पष्ट मानना है कि उन्होंने अपने इस अभियान की शुरुआत प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के “गांव में रात्रि विश्राम” के विचार से प्रेरित होकर की है। इस पहल के तहत राज्यपाल हर सप्ताह एक नई तहसील का दौरा करते हैं और उन्होंने तय कर रखा है कि पूरे गुजरात की 267 तहसीलों तक वह स्वयं पहुंचने के अपने दूरदर्शी लक्ष्य काे हर हाल में पूर्ण करेंगे।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने ब्लिट्ज इंडिया के साथ हुई अपनी बेहद सहज बातचीत में बताया कि वह अब तक इस अभियान के अंतर्गत गुजरात के 17 जिलों और आसपास के क्षेत्रों के 38 से अधिक गांवों के आयोजनों में शामिल हो चुके हैं और उन्होंने अपने प्रत्येक दौरे में लगभग 4000 से 6000 लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया है।
उन्होंने बताया कि इन कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामीण लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है और उनकी समस्याओं को समझकर समाधान की दिशा में कारगर कदम उठाए जाते हैं।
गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत द्वारा गांधीनगर के लोकभवन से शुरू की गई असाधारण पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत @2047 मिशन को सफल बनाने में देश के सभी लोकभवनों के लिए एक अनिवार्य कार्यशैली का रूप ले
सकती है।
- राज्यपाल देवव्रत का असाधारण अभियान सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा रहा है।
- राज्यपाल के ‘हर सप्ताह – एक तहसील’ अभियान ने शासन, समाज और विकास का एक नया मॉडल बनाया है।
- राज्यपाल की इस मुहिम में ‘एक पेड़ मां के नाम’ व स्वच्छ भारत मिशन को भी शामिल किया गया है।
- राज्यपाल का अभियान यूएन के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) का नया कीर्तिमान भी स्थापित कर रहा है।
- राज्यपाल अनुसूचित परिवारों के घर जाकर समानता, सम्मान और आपसी विश्वास का संदेश दे रहे हैं।
- प्रधानमंत्री मोदी के ‘गांव में रात्रि विश्राम’ के विचार से प्रेरित होकर राज्यपाल देवव्रत ने हर सप्ताह एक नई तहसील का दौरा करना प्रारंभ किया। उन्होंने पूरे गुजरात की 267 तहसीलों तक स्वयं पहुंचने का अपना दूरदर्शी लक्ष्य तय किया है।
इस अभियान की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक समरसता को काफ़ी बढ़ावा मिल रहा है। इस अभियान के तहत राज्यपाल स्वयं अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवारों के घर जाकर उनके साथ सादा और सात्विक भोजन करते हैं। इससे समाज में समानता, सम्मान और आपसी विश्वास का संदेश जाता है। साथ ही, परिवारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने का अवसर भी मिलता है जिससे योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन में मदद मिलती है।
राज्यपाल देवव्रत की इस मुहिम के तहत पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देते हुए “ एक पेड़ मां के नाम” पहल को भी विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत सार्वजनिक स्थानों पर वृक्षारोपण किया जाता है और सरपंचों को तीन वर्षों तक उन पेड़ों की देखभाल की जिम्मेदारी दी जाती है। साथ ही, जीवामृत और घन जीवामृत जैसे प्राकृतिक तरीकों से पौधों के संरक्षण की जानकारी देकर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जाता है।
राज्यपाल के इस अभियान में स्वच्छता को जन-आंदोलन बनाने के उद्देश्य से यह अभियान स्वच्छ भारत मिशन को भी मजबूत बना रहा है। इस अभियान में गांवों में साफ-सफाई को केवल एक अभियान नहीं बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जा रहा है। गांवों में राज्यपाल स्वयं लोगों को स्वच्छता का महत्व समझाते हैं और उन्हें अपने स्तर पर सफाई कार्य में भागीदारी के लिए प्रेरित करते हैं। इन कार्यक्रमों में सफाई कर्मचारियों का सम्मान कर समाज में उनके योगदान को भी रेखांकित किया जाता है जिससे “हमारा गांव – स्वच्छ गांव” की भावना को भी मजबूती दी जाती है।
इस अभियान का महत्वपूर्ण पहलू राज्यपाल का गांवों में रात्रि विश्राम करना भी है। वे सरकारी स्कूलों या पंचायत भवनों में साधारण तरीके से रुकते हैं जिससे उन्हें ग्रामीण जीवन को करीब से समझने का अवसर मिलता है। रात्रि में आयोजित ग्राम सभाओं में राज्यपाल गांव के लोगों के साथ खुलकर संवाद करते हैं जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, नशा मुक्ति, महिला सशक्तिकरण, युवाओं के लिए अवसर और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर खुली चर्चा होती है।
बातचीत के दौरान माननीय राज्यपाल ने बताया कि इस अभियान में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना भी उनका एक प्रमुख उद्देश्य है। तहसील स्तर पर आयोजित इन बैठकों में हजारों किसानों और कृषि विशेषज्ञों के साथ संवाद किया जाता है जिसमें रासायनिक खेती के दुष्परिणामों और प्राकृतिक खेती के लाभों पर भी विस्तार से चर्चा होती है। इन बैठकों में किसानों को बताया जाता है कि प्राकृतिक खेती से जमीन की उर्वरता बढ़ती है, उत्पादन में वृद्धि होती है, लागत कम होती है, संसाधनों का कम उपयोग होता है और पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।
महत्वपूर्ण बात यह है की इस अभियान को आम जनों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल माध्यमों से भी व्यापक रूप से प्रचारित किया जा रहा है। पिछले छह महीनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्राकृतिक खेती और ग्रामीण विकास से जुड़े 100 से अधिक वीडियो और पोस्ट साझा किए गए हैं। फेसबुक पर 2 करोड़ 20 लाख से अधिक, इंस्टाग्राम पर 80 लाख से अधिक, एक्स (ट्विटर) पर 10.60 लाख से अधिक और यूट्यूब पर 1.26 लाख से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुंचा है जिससे इस पहल का प्रभाव और भी व्यापक हुआ है।
इसके अलावा, आयोजन के अगले दिन राज्यपाल सुबह के समय पशुपालक परिवारों से मिलते हैं और स्वयं गाय का दूध निकालकर गौ-सेवा का संदेश देते हैं। इस कार्यक्रम में ग्रामीणों को पशुपालन और डेयरी के महत्व के बारे में जागरूक किया जाता है और उनकी आय बढ़ाने के नए अवसरों की जानकारी मिलती है।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत से इस विषय पर हुई लंबी बातचीत से साफ पता चलता है कि उनकी यह पहल शासन के एक नए मॉडल को प्रस्तुत करती है जहां नीतियां केवल कागजों तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि सीधे लोगों तक पहुंचती हैं। राज्यपाल का यह असाधारण अभियान प्रमाणित करता है कि जब नेतृत्व स्वयं आगे बढ़कर जनता से जुड़ता है, तो विकास अधिक प्रभावी, समावेशी और स्थायी बनता है।
निःसंदेह गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत द्वारा “गांधीनगर के लोकभवन” से शुरू की गई देश की यह प्रेरक और असाधारण पहल “आओ चलें गांव की ओर– हर सप्ताह एक तहसील” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत@2047 मिशन को सफल बनाने में देश के सभी लोकभवनों के लिए एक अनिवार्य कार्यशैली का रूप धारण कर सकती है। इसके साथ ही यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों के विकसित नए भारत के निर्माण में बहुत ही सहायक सिद्ध होगी।













