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क्रूड से ज्यादा एलएनजी की सप्लाई में रुकावट से खतरा

एनर्जी सिक्योरिटी के लिए प्रमुख प्रेशर पॉइंट बन कर उभर रहा होर्मुज स्ट्रेट

by Blitz India Media
March 24, 2026
in Hindi Edition
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LPG cylinders
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ब्लिट्ज ब्यूरो

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में संघर्ष जारी रहता है तो भारत को कच्चे तेल (क्रूड) की कमी के मुकाबले लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) की सप्लाई में रुकावट से ज्यादा बड़ा खतरा हो सकता है। इस स्थिति में होर्मुज स्ट्रेट देश की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए एक प्रमुख प्रेशर पॉइंट के तौर पर उभर रहा है। श्रीराम एसेट मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट में इसे लेकर आगाह किया गया है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है- ईरान संकट : भारत और बाजारों के लिए इसके प्रभाव।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लिए एलएनजी सप्लाई का रिस्क तेल से कहीं ज्यादा गंभीर है। इसकी वजह है कि देश के पास गैस आयात के विकल्प सीमित हैं। वहीं, कच्चा तेल (क्रूड) अभी भी अन्य क्षेत्रों से पाया जा सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट पर भारत की बहुत ज्यादा निर्भरता
भारत एनर्जी सप्लाई के लिए होर्मुज स्ट्रेट पर बहुत ज्यादा निर्भर है। उसका लगभग 55–65% एलएनजी इंपोर्ट पानी के इसी पतले रास्ते से होकर गुजरता है। अकेले कतर से ही भारत की गैस आयात का लगभग 40% हिस्सा आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी लंबे समय तक चलने वाली रुकावट से सप्लाई में तत्काल भारी कमी आ सकती है।

फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद यह संकट और गहरा गया। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में जवाबी हमले किए। स्थिति तब और बिगड़ गई जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में नौसैनिक बारूदी सुरंगें बिछाना शुरू कर दिया। इससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण एनर्जी ट्रांजिट रूटों में से एक के लगभग पूरी तरह बंद हो जाने का डर पैदा हो गया। आमतौर पर तेल और एलएनजी टैंकरों सहित लगभग 150 जहाज रोजाना इस स्ट्रेट से गुजरते हैं। ऐसे में बारूदी सुरंगों के जोखिम के कारण जहाजों की आवाजाही रुक सकती है। कारण है कि बीमा कंपनियां संघर्ष वाले क्षेत्र में प्रवेश करने वाले टैंकरों का बीमा करने से मना कर देती हैं।

एलएनजी सप्लाई को बदल पाना मुश्किल
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जहां एक ओर ऑयल मार्केट्स ने इन घटनाक्रमों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। वहीं, भारत रूस से इंपोर्ट बढ़ाकर या सऊदी अरब से आने वाले जहाजों के लिए वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करके क्रूड की सप्लाई में आई रुकावटों की कुछ हद तक भरपाई कर सकता है। हालांकि, एलएनजी सप्लाई को बदलना कहीं ज्यादा मुश्किल है। कारण है कि ग्लोबल ‘स्पॉट मार्केट’ में इसकी उपलब्धता सीमित है। अमेरिका, अफ्रीका या ऑस्ट्रेलिया से आने वाले जहाजों को पहुंचने में ज्यादा समय लगता है। साथ ही उनकी लागत भी ज्यादा आती है।

दिखने लगे हैं शुरुआत संकेत
भारत के घरलू बाजार में तनाव के शुरुआती संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं। गैस की कमी का असर कई उद्योगों पर पड़ने लगा है। उपलब्ध सप्लाई को अब घरों, अस्पतालों और फर्टिलाइजर उत्पादन जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ा जा रहा है। उर्वरक और रसायन निर्माता आयातित कच्चे माल पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। उन्हें अपने उत्पादन में कमी का जोखिम उठाना पड़ रहा है। वहीं, खबरों के अनुसार, शहरी गैस वितरण कंपनियों ने भी औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को होने वाली गैस की सप्लाई में कटौती कर दी है।

विशेष रूप से गुजरात में स्थित सिरेमिक और भवन निर्माण सामग्री बनाने वाली इकाइयों ने भी गैस की उपलब्धता में भारी कमी की शिकायत की है। अनुमान है कि कुछ कारखानों के पास अब केवल कुछ ही दिनों तक काम चलाने लायक ईंन्धन का भंडार बचा है।

रुकावट जारी रही तो बड़े नुकसान का खतरा
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एलपीजी सप्लाई में रुकावटों की वजह से कई इलाकों में बुकिंग में पहले ही देरी हो रही है। सप्लाई की कमी को देखते हुए सरकार ने हाल ही में घरेलू सिलेंडर की कीमतें बढ़ा दी हैं।

अगर यह रुकावट जारी रहती है तो एनर्जी की ज्यादा कीमतें कंपनियों की कमाई को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं। अनुमानों के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतों में एक साल तक लगातार 20 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो कमाई में लगभग 4% तक कमी हो सकती है। इसके अलावा गैस की कमी, उत्पादन में कटौती और कम मांग की वजह से भी और नुकसान का खतरा बना हुआ है।

कुछ सेक्टरों को फायदा भी हो सकता है। तेल और गैस उत्पादकों, रिफाइनरों और मेटल कंपनियों को ग्लोबल कमोडिटी की बढ़ी हुई कीमतों की वजह से ज्यादा कमाई हो सकती है। वहीं, ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों को मुनाफे पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। हालात अभी अनिश्चित बने हुए हैं लेकिन, होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट लंबे समय तक जारी रहती है तो आने वाले महीनों में ग्लोबल एनर्जी बाजार में सप्लाई की कमी बनी रह सकती है।

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