दीपक द्विवेदी
जहां कहीं भी युद्ध की ज्वाला धधक रही है; उसे जल्द से जल्द शांत कराने के प्रयास किए जाने चाहिए, इसी में इस सृष्टि और मानव मात्र का कल्याण निहित है।
अमेरिका और इजरायल द्वारा आखिरकार ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान पर जबरदस्त तरीके से कहर बरपा ही दिया गया। ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले और उसके सुप्रीम नेता अली खामेनेई के मारे जाने के बाद तेहरान ने जैसी प्रतिक्रिया दी है, उससे पश्चिम एशिया के हालात बेहद संगीन हो गए हैं। इन हमलों में अब तक सैकड़ों लोगों के मारे जाने और हजारों के जख्मी होने की सूचना है। हजारों लोग जगह-जगह फंस गए हैं। इसका दुनिया के कूटनीतिक संबंधों और विश्व अर्थव्यवस्था पर संगीन प्रभाव पड़ता साफ नजर आ रहा है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार ईरान के 31 में से 24 प्रांत हमलों का टारगेट बने। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता का भी आह्वान किया है कि अपनी सरकार को उखाड़ फेंके और ईरान पर राज करे। कहने में यह जितना आसान दिखता है पर वास्तविकता में ऐसा हो नहीं रहा। ईरान ने भी इस हमले का ऐसा प्रतिउत्तर दिया है जिसकी कल्पना शायद अमेरिका और इजरायल ने भी नहीं की होगी। ईरान ने पश्चिम एशिया के अनेक देशों में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमला किया। कतर, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ ड्रोन और मिसाइल दागे गए। इसके अलावा दुबई के आलीशान इलाके पाम में फेयरमोंट होटल पर भी बम गिरए गए। इजरायल के भी कई शहर ईरान के निशाने पर आए। कहा नहीं जा सकता कि अभी और कहां-कहां पर बम गिरेंगे लेकिन टीवी पर दिखाई जा रही तस्वीरें बहुत भयावह नजर आ रही हैं।
जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, इस युद्ध का दायरा बढ़ता ही जा रहा है और अब इसका व्यापक असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। इसका सबसे बड़ा और बुरा प्रभाव कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ेगा, अगर यह युद्ध और लंबा चल गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तेल और गैस की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं क्योंकि ईरान दुनिया में कच्चे तेल के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। जिन देशों में अमेरिकी ठिकानों पर ईरान ने हमला किया है, वे भी इस तेल उत्पादक समूह में शामिल हैं। साथ ही होर्मुज जलडमरू मध्य का क्षेत्र भी ईरान के कब्जे वाले इलाके में आता है और उसका दावा है कि वह इसे बंद कर चुका है जिसका सीधा असर भारतीय तेल आपूर्ति पर भी पड़ेगा और भारत की तेल खपत का एक बड़ा भाग अर्थात करीब 40 फीसदी तेल और गैस इसी रास्ते से आता है। इस रास्ते को दुनिया में तेल, गैस या ऊर्जा सप्लाई की जीवन रेखा भी कहा जाता है। वास्तव में सागर के रास्ते से दुनिया में जितनी भी तेल और गैस की आपूर्ति होती है; उसका लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से हो कर गुजरता है और ईरान दुनिया में सबसे अधिक तेल उत्पादन करने वाले देशों में से एक है।
जिस तरह पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश अपने विवाद सुलझाने के लिए युद्ध करने लग जाते हैं, उससे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वे संवाद के स्थान पर अब संघर्ष को ही झगड़े हल करने की अंतिम युक्ति मानने लगे हैं। शक्तिशाली देश भी विवादों को सुलझाने के बजाय उनमें स्वयं संलिप्त होते नजर आ रहे हैं जो बड़े आश्चर्य की बात है। होना तो यह चाहिए कि उन्हें समझदारी दिखाते हुए हर तरह से युद्धों को रोकने के उपाय करने चाहिए क्योंकि युद्ध सदैव से ही मानव जाति के विनाश का कारक बने हैं। यही नहीं, इनकी बड़ी कीमत उन देशों को भी चुकानी पड़ती है जो युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं होते। इस समय भी अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध ने पश्चिम एशिया के बड़े इलाके को चपेट में ले रखा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि लड़ाई चार से पांच हफ्ते तक चलेगी और यदि लंबी खिंची तो उसके लिए भी उनका देश तैयार है। वैसे यह युद्ध लंबा न चले, इसी में सबकी भलाई है। लंबे युद्ध से सिर्फ हथियार बेचने वाली कंपनियों को ही लाभ होता है और युद्धरत देशों के साथ अन्य देशों की भी अर्थव्यवस्था बिगड़ती है। मीडिया में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका ने पहले 24 घंटे में ही ईरान के साथ संघर्ष पर करीब 72 अरब रुपये खर्च कर दिए। युद्ध से हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर के नुकसान का हिसाब तो अलग है जबकि मानवीय क्षति का हिसाब लगाना तो सबसे कठिन। इसलिए जहां कहीं भी युद्ध की ज्वाला धधक रही है; उसे जल्द से जल्द शांत कराने के प्रयास किए जाने चाहिए, इसी में इस सृष्टि और मानव मात्र का कल्याण निहित है।







