ब्लिट्ज ब्यूरो
लखनऊ। अब ऑपरेशन से पहले एनस्थीसिया (बेहोशी) देना और भी सुरक्षित हो गया है। बेहोशी देने से पहले मरीज की सांस की नली में सिकुड़न का सटीक पता लगाया जा सकता है। वहीं ऑक्सीजन के लिए नली भी सही जगह बिना किसी जटिलता के पहुंचाकर मरीज को सांसें दी जा सकती हैं। आईसीयू में वेंटिलेटर पर भर्ती का और सुरक्षित इलाज मुहैया कराया जा सकता है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित तकनीक से मुमकिन हो सका है। यह जानकारी केजीएमयू कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने दी। होटल क्लार्क अवध में एआईडीएए लखनऊ शाखा की ओर से एयरवे मैनेजमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं सिमुलेशन की भूमिका विषय पर सेमिनार हुआ।
कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद ने कहा कि एआई एयरवे मैनेजमेंट को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। ऑपरेशन थिएटर और इमरजेंसी स्थितियों में एआई का उपयोग मरीज की सुरक्षा को कई गुना बढ़ा सकता है। जोखिम का अंदाजा लगाना आसान एनस्थीसिया विभाग के डॉ. तन्मय तिवारी ने कहा कि एयरवे मैनेजमेंट यानी सांस के रास्ते को सुरक्षित रखना, बेहोशी और आपातकालीन चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ऐसे में एआई से युक्त मॉनिटरिंग सिस्टम मरीज के दिल की धड़कन, ऑक्सीजन स्तर, ब्लड प्रेशर और श्वसन दर जैसे महत्वपूर्ण शारीरिक मानकों का लगातार विश्लेषण करते रहते हैं। यदि किसी भी पैरामीटर में असामान्य बदलाव दिखाई देता है तो सिस्टम तुरंत डॉक्टर को अलर्ट कर देता है। उन्होंने कहा कि मरीज को नाक, मुंह और गले के रास्ते से नली डालकर ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में नली डालते समय चोट लगने की आशंका रहती है। जिससे रक्तस्राव का खतरा रहता है। नई तकनीक से यह जोखिम कम होगा। ग्रामीण क्षेत्र को टेली सपोर्ट की संजीवनी डॉ. तन्मय तिवारी ने कहा कि एआई डॉक्टरों का विकल्प नहीं है, बल्कि उनकी बौद्धिक क्षमता और क्लीनिकल निर्णय को सशक्त बनाने का साधन है। एआई आधारित निर्णय सहायता प्रणाली और टेली-सपोर्ट तकनीक के माध्यम से ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में भी उच्च गुणवत्ता वाली एनेस्थीसिया एवं एयरवे सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
दवा की सही डोज तय करना आसान एनस्थीसिया विभाग की अध्यक्ष डॉ. मोनिका कोहली ने कहा कि एआई तकनीक एनेस्थीसिया की दवाओं की सही मात्रा तय करने में भी सहायक साबित हो रही है। मरीज की उम्र, वजन, स्वास्थ्य स्थिति और सर्जरी की प्रकृति के आधार पर एल्गोरिदम दवा की उपयुक्त डोज सुझा सकते हैं, जिससे ओवरडोज या अंडरडोज का खतरा कम हो जाता है। डॉ. मोनिका कोहली ने कहा कि एआई पूरी तरह से मानव विशेषज्ञता का विकल्प नहीं है। बल्कि यह एक सहायक उपकरण है। अंतिम फैसला डॉक्टर ही लेते हैं, लेकिन एआई के सहयोग से निर्णय अधिक सटीक और तेज हो सकते हैं। प्रशिक्षण जरूरी टाटा मेमोरियल के डॉ. सोहन सोलंकी ने कहा कि सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण जरूरी है। हाई-फिडेलिटी सिमुलेशन लैब में डॉक्टरों को जटिल परिस्थितियों का अभ्यास कराया जा सकता है। जिससे वास्तविक ऑपरेशन थिएटर में गलतियों की आशंका कम होती है। सिमुलेशन तकनीक से टीमवर्क, संचार कौशल और संकट प्रबंधन क्षमता भी बेहतर होती है। कार्यक्रम में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के डॉ. विशाल देव, डॉ. अपर्णा शुक्ला, डॉ. दिनेश कौशल, डॉ. मनोज चौरसिया, डॉ. मनोज गिरी, डॉ. आशीष कन्नौजिया मौजूद रहे।







