ब्लिट्ज ब्यूरो
मथुरा। बरसाना और नंदगांव की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली के भव्य आयोजन के बाद होली का खुमार भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा के आंगन में सिर चढ़कर बोला। पूरा श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर अबीर, गुलाल और फूलों की खुशबू से सराबोर हो गया। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के साथ होली खेलकर खुद को धन्य महसूस किया।
द्वापर युग की परंपरा का जीवंत रूप
प्राकृतिक बसंत उत्सव के इस अलौकिक परिवेश में ब्रज की होली का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि होली की शुरुआत द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने की थी। ब्रज में होली का यह हुल्लड़ बसंत पंचमी से शुरू होकर पूरे 40 दिनों तक चलता है।
ठाकुर जी ने खेली होली
कहा जाता है कि बरसाना और नंदगांव में गोपियों के साथ होली खेलने के पश्चात एकादशी के दिन भगवान मथुरा में होली खेलने पधारे थे। कपिल शर्मा (सचिव, श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, मथुरा) ने बताया आज रंग-भरी एकादशी के दिन ठाकुर जी ने भक्तों के साथ होली खेली है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और समूचा जन्मस्थान परिसर प्रेम और भक्ति के रंग में डूबा नजर आता है।
लीला मंच पर सांस्कृतिक छटा
जन्मस्थान स्थित लीला मंच पर आयोजित कार्यक्रम में राधा-कृष्ण के स्वरूपों ने मनमोहक रासलीलाओं का मंचन किया। इस दौरान मथुरा के हुरियारे और हुरियारिनों ने पारंपरिक लोक गीतों पर जमकर ठुमके लगाए। महोत्सव में ब्रज का प्रसिद्ध ‘मयूर नृत्य’ और ‘चरकुला नृत्य’ आकर्षण का केंद्र रहे। इन प्रस्तुतियों को देख वहां मौजूद हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगे।
फूलों की वर्षा और प्रेम की लाठियां
जैसे ही लीला मंच से राधा-कृष्ण के स्वरूपों ने भक्तों पर फूलों की वर्षा शुरू की, पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा। इसी बीच मंच पर मौजूद हुरियारिनों ने हुरियारों पर प्रेम की लाठियां बरसाकर लट्ठमार होली की जीवंत परंपरा को दोहराया। रंगों की फुहार और गुलाल के बीच ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो साक्षात प्रिया-प्रीतम अपने भक्तों के बीच उपस्थित हों।
अविस्मरणीय अनुभव
यहां आए श्रद्धालुओं का कहना है कि जन्मस्थान पर खेली गई यह होली उनके जीवन का सबसे यादगार पल है। भक्ति और उल्लास का यह संगम इस बात का प्रमाण है कि जो भक्त एक बार ब्रज की होली का आनंद ले लेता है, वह इस स्मृति को जीवन भर अपने हृदय में संजो कर रखता है।













