ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना में काम कर रहे फाइटर जेट्स के इंजनों का भारत में ही सीरियल प्रोडक्शन किया जा सके, इसकी चर्चा करने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के सीएमडी रूस के दौरे पर गए थे। भारत-रूस सुखोई विमानों के लिए संयुक्त रूप से इंजन बनाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इसके लिए विशेष रूप से सुखोई-30एमकेआई बेड़े में उपयोग किए जाने वाले एएल-31एफपी इंजन पर फोकस किया जा रहा है।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के सीएमडी डीके सुनील के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू जेट के लिए 240 एएल -31 एफपी एयरो इंजन के लाइसेंस निर्माण के लिए एक समझौते पर साइन करने के लिए रूस का दौरा किया। यह पहल स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने और विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता को कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
वायुसेना में लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमी
सरकार ने हाल ही में 240 एएल -31 एफपी इंजनों की खरीद के लिए एचएएल के साथ 26 हजार करोड़ रुपये (करीब 3.1 बिलियन डॉलर) के अनुबंध को अंतिम रूप दिया है। इस सौदे का मकसद भारतीय वायु सेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के बेड़े की क्षमता को बढ़ाना है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये भी है कि भारतीय वायुसेना में लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी है। इस दृष्टि से ये कदम बेहद महत्वपूर्ण है। एचएएल ने उत्पादन के दौरान इन इंजनों के स्वदेशी कंटेंट को 54 प्रतिशत से बढ़ाकर 63 प्रतिशत करने की योजना बनाई है। इस कदम का उद्देश्य लोकल मेन्युफैक्चरिंग की क्षमताओं को बढ़ावा देना और रूसी कंपोनेंट्स पर निर्भरता को कम करना भी है। इंजनों का निर्माण ओडिशा में एचएएल की कोरापुट फैसिलिटी में किया जाएगा और कुछ कंपोनेंट्स अभी रूस से मंगाए जाएंगे।
ज्वाइंट प्रोडक्शन वेंचर पर भी चर्चा
इसके अलावा भारत और रूस के बीच संभावित ज्वाइंट प्रोडक्शन वेंचर पर भी चर्चा चल रही है। इसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी शामिल हो सकता है। इंजन खरीद के साथ-साथ एचएएल 65 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत पर पूरे सुखोई-30 बेड़े को अपग्रेड करने के लिए भी तैयार है।
किसी फाइटर जेट को अपने कार्यकाल के दौरान अतिरिक्त इंजनों की आवश्यकता होती है। आमतौर पर फाइटर जेट का जीवनकाल 30 से 40 साल तक का होता है। इस बीच इंजनों को दो से तीन बार बदला जाता है। भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के लिए भी नए इंजनों की ज़रूरत है। इसी वजह से रक्षा मंत्रालय ने इन जेट के लिए एएल -31 एफपी इंजन खरीदने का फैसला किया।
तेजस विमान के लिए अमेरिका से इंजन आने में इस साल हुई देरी के बाद भारत भविष्य में फाइटर जेट्स के इंजनों को लेकर विदेशों पर अपनी निर्भरता समाप्त करना चाहता है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सीएमडी डॉक्टर डीके सुनील रूस में एयरक्राफ्ट इंजन की डिजाइन और उत्पादन से जुड़ी फैक्ट्री में भी गए।
वहां उन्होंने एयरक्राफ्ट इंजन की डिजाइन और उत्पादन से जुड़ी जानकारियां ली। भारत को अपनी वायु सेवा और नौसेना के फाइटर जेट के लिए अगले एक दशक में 1000 से ज्यादा इंजन की आवश्यकता होगी। इनमें से ज्यादातर विमान भारत में ही बनाए जाएंगे।













