ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में गर्मी को लेकर बात की। पीएम ने कहा- हमारे यहां गर्मी से लड़ने का तरीका कई बार रसोई में भी मिलता है। आपने भी देखा होगा जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वैसे-वैसे घर की रसोई का स्वाद बदल जाता है।
पीएम ने कार्यक्रम में इस वक्त देश के दो चर्चित एथलीटों की भी बात की। पीएम ने कहा- एक इवेंट जिसकी देशभर में बहुत चर्चा हो रही है, वह है 100 मीटर की रेस। महज दो दिनों के भीतर मेंस 100 मीटर रेस में नेशनल रिकॉर्ड तीन बार टूटा। जिन दो एथलीट्स ने ये कमाल दिखाया है वे हैं- गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर।
-मैं अपने किसान भाई-बहनों की प्रशंसा करूंगा। आप देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए आम किसान नहीं, बेहद विशेष हैं।
दरअसल गुरिंदरवीर सिंह ने रांची के बिरसा मुंडा स्टेडियम में आयोजित फेडरेशन कप सीनियर नेशनल एथलेटिक्स टूर्नामेंट की पुरुषों की 100 मीटर रेस 10.09 सेकेंड में पूरी की। वे भारत के सबसे तेज धावक बने। गुरिंदरवीर ने अपने प्रतिद्वंद्वी अनिमेष कुजूर को पीछे छोड़ा। पहले यह रिकॉर्ड अनिमेष के नाम था।
‘मन की बात’ कार्यक्रम में पीएम की बड़ी बातें-
- गर्मी में देशी पेय जल पीते रहें। उत्तर भारत में आम पन्ना और कच्चे आम का स्वाद गर्मी से राहत देता है।
- पंजाब और हरियाणा में लस्सी तथा राजस्थान और गुजरात में छाछ हर खाने की साथी बन जाती है।
- बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्तू का शरबत पेट भरने के साथ ताकत भी देता है।
- कोंकण और गोवा में कोकम शरबत और सोल कढ़ी प्रचलित हैं। दक्षिण भारत में पानकम, नीर मोर, सम्बारम तथा ओडिशा में बेल पन्ना केवल पेय नहीं, बल्कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की परंपरा का हिस्सा हैं।
गर्मी में आम की खुशबू हर घर में: गर्मी आते ही एक और चर्चा हर घर में शुरु हो जाती है और वो है आम। हर इलाके का अपना आम, अपना स्वाद, अपनी खुशबू होती है। महाराष्ट्र और कोंकण का हापुस, अल्फांसो, गुजरात का केसर यह तो आमरस की जान है। उत्तर प्रदेश का दशहरी और मेरी काशी का लंगड़ा।
दक्षिण भारत जाइए, तो बंगनपल्ली, तोतापुरी, नीलम, मलगोवा, बंगाल का हिमसागर, ओडिशा और आंध्र प्रदेश का सुवर्णरखा। यानी जगह बदलती है, आम का रूप-रंग और उसका स्वाद भी बदल जाता है। साथियों आम की ये यात्रा, अब गांव से ग्लोबल मार्केट तक भी पहुंच रही है। मैं आम की पैदावार से जुड़े अपने किसान भाई-बहनों की प्रशंसा करूंगा। आप देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए आम किसान नहीं बहुत विशेष हैं।
देशभर में एस्ट्रोनॉमी क्लब तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं: हम भारतीयों में खगोल विज्ञान यानी एस्ट्रोनॉमी को लेकर हमेशा विशेष आकर्षण रहा है। नेविगेशन हो, पंचांग हो, या हमारे पर्व-त्योहार इन सबका संबंध आकाश और तारों से रहा है। युवाओं में भी इसको लेकर काफी इंट्रेस्ट है।
देशभर में एस्ट्रोनॉमी क्लब तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। मुझे बेंगलुरु एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के बारे में जानकारी मिली। यहां ऑब्जर्वेशनल सेशन आयोजित किए जाते हैं।’खगोल मण्डल’ नाम की एक टीम ने 30 घंटे का एक बहुत इनोवेटिव कोर्स शुरू किया है। ऐसे ही केरलम और गुजरात में भी एस्ट्रोनॉमी इवेंट आयोजित किए जाते हैं।
तमिलनाडु स्कूल में सैनिकों के लिए फंड जुटाया जाता है: पिछले महीने तमिलनाडु के नागरकोइल में मेरी मुलाकात एक टीचर से हुई। करीब तीन दशक पहले भी मैं उनसे मिला था। मैं बात कर रहा हूं, गिरिजा अम्मा जी की। गिरिजा अम्मा जी करीब 15 स्कूल चलाती हैं। इनमें चेन्नई का जयगोपाल गरोडिया हिन्दू विद्यालय बहुत प्रमुख है। उनकी देशभक्ति की भावना हर भारतवासी को प्रेरित करने वाली है।
उन्होंने ‘मन की बात’ से प्रेरणा लेकर देश के अनेक सैनिकों के लिए योगदान का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने अपने सभी स्कूलों के स्टूडेंट्स को प्रेरित किया। उन्होंने बच्चों से कहा कि वे वीर जवानों के लिए ‘हर दिन एक रुपया’ योगदान दें। यानी एक साल में हर स्टूडेंट की ओर से 365 रुपये जमा हुए। इस छोटे-छोटे योगदान से करीब 40 लाख रुपये इकट्ठा हुए। पीएम मोदी ने 16 अप्रैल को तमिलनाडु में गिरिजा अम्मा से मुलाकात की थी।
नीदरलैंड से चोल वंश की ताम्र पट्टिकाएं लाई गईं
बीते दिनों मुझे नीदरलैंड जाने का अवसर मिला। वहां एक विशेष समारोह में चोल काल की प्राचीन ताम्र पट्टिकाएं भारत को वापस सौंपी गईं। उस कार्यक्रम में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे। इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर मुझे देश-विदेश से लगातार मैसेज मिल रहे हैं। लोग खुशी जता रहे हैं।
इन ताम्र पट्टिकाओं को लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा भी है। इनमें 21 बड़ी और तीन छोटी ताम्र पट्टिकाएं हैं। ये मुख्य रूप से राजा राजेंद्र चोल-प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजराजा चोल के एक वचन को पूरा करने से जुड़ी हैं। इनमें आनइमंगलम गांव को एक बौद्ध विहार को दान देने का उल्लेख है। इन ताम्र पट्टिकाओं में चोल वंश की उपलब्धियों का भी वर्णन मिलता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ये इन्कि्रप्शन 1000 साल से ज्यादा पुराने हैं। ये ताम्र पट्टिकाएं प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं।
इनसे उस समय की शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। भारत 2012 से ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी की मांग कर रहा था।













