ब्लिट्ज ब्यूरो
मुंबई। आज के दौर में महिलाएं भी अब हर क्षेत्र में मजबूती से अपनी पहचान बना रही हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी मध्य रेलवे की पॉइंट्स वुमन रूपाली खरे की है, जिनकी जिंदगी संघर्षो से भरी रही, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। रूपाली खरे की जिंदगी आसान नहीं रही। पति के निधन के बाद उन्हें मध्य रेलवे में पॉइंट्स वुमन के पद पर नौकरी मिली। उस समय उनके बच्चे बहुत छोटे थे और जिम्मेदारियां अचानक बढ़ गई थी।
बच्चों की परवरिश और नौकरी दोनों को संभालने के लिए रूपाली ने एक कठिन रास्ता चुना। उन्होंने अपने बच्चों को पुणे में अपने माता-पिता के पास रखा, जबकि उनकी नौकरी मुंबई में थी। ऐसे में उन्हें लगभग हर हफ्ते 4 बार मुंबई-पुणे अप-डाउन करना पड़ता था। कभी दिन तो कभी रात में नौकरी और फिर लंबा सफर। यह उनके लिए किसी डबल ड्यूटी से कम नहीं था। आज करीब 15 साल बाद उनके बच्चे बड़े हो चुके हैं और कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं। इस बीच उनकी मां का निधन हो चुका और पिता की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। इसके बावजूद रूपाली पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वह कहती है कि छोटे बेटे की 10वीं की परीक्षा के बाद वह मुंबई शिफ्ट होने का विचार कर रही है। फिलहाल जब उन्हें डबल शिफ्ट मिलती है, तो वह उसे करना पसंद करती है, ताकि जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभा सकें।
दादर स्टेशन पर भी रूपाली दे चुकी हैं सेवाएं
वर्तमान में रूपाली खरे माटुंगा (सेंट्रल) स्टेशन पर तैनात है। माटुंगा को ‘पिंक स्टेशन’ के रूप में जाना जाता है, क्योकि यहां स्टेशन से जुड़े सभी काम महिलाएं ही संभालती है। छोटे से बड़े तक हर जिम्मेदारी महिला कर्मचारियों के कंधों पर है। इससे पहले रूपाली दादर स्टेशन पर भी काम कर चुकी हैं, जिसे मुंबई के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों मे से एक माना जाता है। वह बताती हैं कि रेलवे में काम करते समय कई बार चुनौतीपूर्ण हालात का सामना करना पड़ता है। फिलहाल हम सभी मिलकर हर तरह का काम करते हैं, चाहे ट्रेन का एक्सिडेंट हो, ट्रेन में आग लग जाए या किसी यात्री ने इमरजेंसी चेन खींच दी हो। हमारा सबसे महत्वपूर्ण काम यह समझना होता है कि यदि ट्रेन रुकी है, तो क्यों रुकी है, समस्या क्या है और उसे जल्द से जल्द कैसे हल किया जाए। इसके बाद ट्रेन को सुरक्षित तरीके से रवाना करने के लिए हरी झंडी दिखाना और गार्ड तथा मोटरमैन के साथ लगातार समन्वय बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी होती है।
मदद कर बचाई थी जान
रूपाली बताती हैं कि कई बार इंसानी संवेदनाएं भी इस नौकरी का बड़ा हिस्सा बन जाती हैं। यदि किसी का एक्सिडेंट हो जाता है, तो जीआरपी और आरपीएफ के साथ समन्वय करके घायल व्यक्ति को तुरंत अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी भी रेलवे स्टाफ की होती है। उन्होंने कई ऐसे मामले हैंडल किए हैं, जहां उनके और उनकी टीम की वजह से कइयों की जान बची है।
एक घटना को याद करते हुए वह बताती है, एक बार एक व्यक्ति ट्रेन के नीचे आ गया था। उस समय स्टेशन पर ज्यादा सपोर्टिंग स्टाफ नहीं था। मैंने वहां मौजूद लोगों को इकट्ठा किया और उनकी मदद से उस व्यक्ति को बाहर निकाला। फिर उसे तुरंत अस्पताल भेजा गया। समय पर मदद मिलने से उसकी जान बच गई।













