राजेश दुबे
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि फर्जी या गैर-मौजूद एआई फैसलों के आधार पर दिए गए आदेशों को केवल निर्णय की गलती नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे गंभीर ‘न्यायिक कदाचार’ यानी ‘मिसकंडक्ट’ की श्रेणी में रखा जाएगा। साथ ही कोर्ट ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक आराधे की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका के दौरान सामने आए मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि वह मामले की विस्तार से जांच करेगा और ऐसे काल्पनिक फैसलों का इस्तेमाल केवल मानवीय भूल नहीं, बल्कि न्यायिक कदाचार माना जाएगा। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह एआई द्वारा निर्मित कृत्रिम और गैर-मौजूद फैसलों के परिणामों और जवाबदेही की विस्तार से जांच करेगी।
पीठ ने कहा, ‘हम ट्रायल कोर्ट द्वारा एआई द्वारा उत्पन्न गैर-मौजूद, फर्जी या कृत्रिम कथित निर्णयों का संज्ञान लेते हैं और इसके परिणामों और जवाबदेही की जांच करना चाहते हैं। क्योंकि इसका न्यायिक प्रक्रिया की अखंडता पर सीधा असर पड़ता है।’
बेंच ने अपने आदेश में कहा कि सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि इस प्रकार के निराधार और फर्जी कथित निर्णयों पर आधारित निर्णय लेना निर्णय लेने में त्रुटि नहीं है। ये कदाचार होगा और इसके कानूनी परिणाम भुगतने होंगे। ये आवश्यक है कि हम इस मुद्दे की अधिक विस्तार से जांच करें।













