ब्लिट्ज ब्यूरो
सोमनाथ। भगवान शिव के 12ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ की गाथा भारत की सभ्यता, चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और अटूट विश्वास की अमर कहानी है।
अरब सागर की लहरों के किनारे खड़ा सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का वह शाश्वत स्वर है, जिसने हजारों वर्षों के संघर्ष, आक्रमण और पुनर्निर्माण के बाद भी अपनी आस्था की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज 75 वर्ष बाद सोमनाथ फिर इतिहास के एक महत्वपूर्ण पड़ाव का साक्षी बना है।
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मंदिर पर 1026 में हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष और 1951 में पुनर्प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी है, इस अवसर पर सोमवार को मंदिर पहुंचे। उन्होंने सोमनाथ को ‘भारत की अजेय भावना’ का प्रतीक बताया। लेकिन गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रभास पाटन स्थित सोमनाथ मंदिर के इतिहास को समझते है, जो सदियों से श्रद्धा का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। मान्यता है कि चंद्रदेव ने भगवान शिव की आराधना कर यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में भी सोमनाथ को प्रथम स्थान दिया गया है, जो इसकी आध्यात्मिक महत्ता को और अधिक ऊंचाई प्रदान करता है। लेकिन सोमनाथ का इतिहास केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष और पुनर्जन्म की ऐसी कथा है, जिसने हर भारतीय के मन में स्वाभिमान का दीप जलाए रखा। वर्ष 1026 में महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर पहला बड़ा आक्रमण किया।
इसके बाद 11वीं से 18वीं शताब्दी तक सोमनाथ को बार-बार तोड़ा गया, लूटा गया, मिटाने की कोशिश की गई। मगर हर बार मंदिर फिर खड़ा हुआ। जैसे कोई सभ्यता यह घोषित कर रही हो कि आस्था को तलवारों से पराजित नहीं किया जा सकता। राजा कुमारपाल से लेकर जूनागढ़ के शासकों और मराठा साम्राज्ञी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर तक अनेक राजाओं और भक्तों ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण कराया। वीर हमीरजी गोहिल जैसे योद्धाओं ने मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यही कारण है कि सोमनाथ केवल पत्थरों से बना मंदिर नहीं, बल्कि त्याग, श्रद्धा और राष्ट्रचेतना का प्रतीक बन गया।













