राजेश दुबे
नई दिल्ली। नॉर्थ ईस्ट के लोगों के खिलाफ कथित नस्ली और क्षेत्रीय भेदभाव से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में तेजी से ट्रायल की जरूरत है। यह आदेश उस जनहित याचिका पर दिया, जिसे अधिवक्ता मोदोइया कायिना ने दायर किया था और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने दलील पेश की थी।
याचिका में निडो तानिया केस का भी जिक्र ः याचिका में 2014 के निडो तानिया हत्याकांड का भी हवाला दिया गया। अरुणाचल प्रदेश के छात्र निडो तानिया की दिल्ली में कथित नस्ली हमले में मौत के बाद गृह मंत्रालय ने एमपी बेजबरुआ समिति गठित की थी। समिति ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए थे, लेकिन प्रभावी संस्थागत प्रतिक्रिया नहीं दिखी। वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने बताया कि मुख्य मांग ऐसे मामलों में समयबद्ध ट्रायल की है। जांच पूरी होने और चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी मुकदमे 3-4 साल तक लंबित पड़े रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध है कि वह प्रशासनिक पक्ष पर इस मुद्दे पर विचार करें और समग्र नीतिगत फैसला ले, ताकि ऐसे संवेदनशील ट्रायल के प्राथमिकता के आधार पर निपटारे के लिए उपयोगी समयसीमा सुनिश्चित की जा सके।
पहले भी उठ चुका है मुद्दा
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने नॉर्थईस्ट के लोगों के खिलाफ नस्ली हिंसा रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग वाली एक अन्य याचिका भी सुनी थी। तब अदालत ने भारत के अटॉर्नी जनरल से उठाए गए मुद्दों की जांच करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील मामलों का सामान्य क्रम से हटकर, प्राथमिकता के आधार पर निपटारा होना चाहिए।
मामले की बड़ी बातें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, संवेदनशील मामलों में आउट ऑफ टर्न सुनवाई जरूरी
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से समग्र नीति पर विचार का अनुरोध
याचिका में नॉर्थ ईस्ट के लोगों के खिलाफ नस्ली हिंसा में निडो तानिया केस और एमपी बेजबरुआ समिति की रिपोर्ट का हवाला
कोर्ट ने केस के गुण-दोष और मेरिट पर टिप्पणी किए बिना समयबद्ध ट्रायल की जरूरत बताई













