राजेश दुबे
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि अगर किसी विदेशी अदालत ने संक्षिप्त कार्यवाही में कोई फैसला सुनाया, जिसमें बचाव का कोई सार्थक अवसर नहीं दिया गया, जबकि मामले में विचारणीय मुद्दे मौजूद थे तो ऐसा फैसला भारत में ‘दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908’ (सीपीसी) की धारा 13 के तहत लागू नहीं किया जा सकता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने मेसर ग्रीशाइम (एयर लिक्विड डॉयचलैंड जीएमबीएच) द्वारा दायर दीवानी अपील खारिज कर दी। खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें गोयल एमजी गैसेस प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ अंग्रेजी अदालत द्वारा पारित आदेश (डिक्री) को लागू करने से इनकार किया गया था।
‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का उल्लंघन
अदालत ने टिप्पणी की कि संक्षिप्त क्षेत्राधिकार (समरी जुरिसडिक्शन) में किसी मामले का निपटारा करना—विशेषकर तब, जब विवाद में ऐसे तथ्य शामिल हों, जिनकी गहन जांच-पड़ताल की आवश्यकता हो—मामले का समय से पहले निपटारा माना जाएगा और यह ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का उल्लंघन करता है। मामले की पृष्ठभूमि यह विवाद 1995 में विदेशी अपीलकर्ता और भारतीय प्रतिवादी के बीच हुए एक ‘शेयर खरीद और सहयोग समझौते’ से शुरू हुआ। इस समझौते का उद्देश्य औद्योगिक गैसों के निर्माण और व्यापार के लिए संयुक्त उद्यम कंपनी स्थापित करना था। इसके बाद प्रतिवादी ने सिटीबैंक यूके से एक ‘बाह्य वाणिज्यिक उधार सुविधा’ प्राप्त की, जिसकी गारंटी अपीलकर्ता ने दी थी। जब प्रतिवादी ऋण चुकाने में चूक गया तो ऋणदाता ने गारंटी को लागू किया।
यह था मामला
अपीलकर्ता ने लगभग 4.78 मिलियन अमेरिकी डॉलर की बकाया देनदारी का भुगतान किया। उसके बाद अपने ‘सब्रोगेशन अधिकारों’ का प्रयोग करते हुए प्रतिवादी से उस राशि की प्रतिपूर्ति की मांग की। अपीलकर्ता ने अंग्रेजी कोर्ट में कानूनी कार्यवाही शुरू की, जिसने शुरू में एक ‘डिफ़ॉल्ट फैसला’ सुनाया। बाद में अदालत ने डिफ़ॉल्ट फैसला रद किया और ‘संक्षिप्त फैसला’ जारी करते हुए प्रतिवादी को दावा की गई राशि, साथ ही उस पर ब्याज और खर्च का भुगतान करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट में ‘निष्पादन कार्यवाही’ दायर
इसके बाद अपीलकर्ता ने सीपीसी की धारा 44ए के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में ‘निष्पादन कार्यवाही’ दायर की, जिसमें भारत में उस विदेशी फैसले को लागू करने की मांग की गई।













