ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली सीरिया में असद सरकार के अंत से पड़ोसी तुर्की काफी खुश नजर आ रहा है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोगन ने सीरिया के बदले हालात पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि सीरिया धार्मिक और सांप्रदायिक समुदाय के साथ सिर्फ सीरियाई लोगों का है लेकिन तुर्की की खुशी की असल वजह क्या है?
सीरिया के हालात पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि पड़ोसी सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के पतन के साथ, तुर्की के पास एक ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी को उखाड़ फेंकने का मौका है, ताकि वह इस क्षेत्र में अधिक ताकतवर बन सके। तुर्की विद्रोहियों के एक गुट का समर्थन करता रहा है। अब ये माना जा रहा है कि तुर्की, सीरिया का संरक्षक बनकर सामने आएगा। वहीं, तुर्की और रूस के रिश्तों में जारी तल्खी भी कम हो सकती है, क्योंकि दमिश्क में ईरान और रूस की जगह तुर्की का प्रभाव बढ़ जाएगा।
तुर्की का रोल
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट थिंक टैंक के उपाध्यक्ष पॉल सलेम ने बताया, ‘विद्रोहियों ने असद राजवंश के पांच दशक से अधिक के शासन को समाप्त कर दिया है, ये तुर्की की भी बड़ी जीत है, क्योंकि उसकी समर्थित सेना भी इस जंग में अहम हिस्सा रही है लेकिन इस्लामवादी नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा असद को सत्ता से बेदखल करने से सीरिया का भविष्य अभी अधर में है। दरअसल, इस जीत के साथ एक सफल परिवर्तन का हिस्सा बनने की जिम्मेदारी भी आती है। बता दें कि पिछले एक दशक से सीरिया एक ऐसा अखाड़ा बना हुआ था, जिसमें कई देशों द्वारा समर्थित पहलवान उतरे हुए थे। तुर्की भी इन्हीं में से एक है।
तुर्की ने लंबे समय से उन विद्रोही गुटों का समर्थन किया, जो रूस और ईरान समर्थित बशर अल-असद सरकार को हटाना चाहते थे। इसके पीछे वजह ये थी कि तुर्की, सीरिया में ऐसी सरकार चाहता था, जो उसकी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कुर्दिश गुटों को रोके।
क्या ‘सीरिया का नया संरक्षक’ बनेगा तुर्की
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के तुर्की कार्यक्रम के निदेशक गोनुल टोल का कहना है कि विदेश नीति के मोर्चे पर असद सरकार के पतन से तुर्की को ईरान के साथ अपदस्थ सीरियाई राष्ट्रपति के प्रमुख सहयोगी रूस के साथ अपने व्यवहार में फेरबदल करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि पहले युद्ध ने अंकारा को मॉस्को में लिए गए निर्णयों के प्रति ‘असुरक्षित’ बना दिया था, सीरिया के उत्तर-पश्चिम में सीमा पर रूसी बमबारी से शरणार्थियों की एक नई आमद की आशंका बढ़ गई थी लेकिन असद सरकार के अंत के बाद अब ‘रूस के साथ संबंधों में तुर्की का हाथ मजबूत होगा।’ इसी तरह वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर ईस्ट पॉलिसी के वरिष्ठ फेलो सोनेर कैगाप्टे ने भविष्यवाणी की कि ‘दमिश्क में ईरान और रूस की जगह तुर्की का प्रभाव बढ़ जाएगा।’













