ब्लिट्ज ब्यूरो
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव-2026 अब तय समय पर होंगे या नहीं, इस पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में योगी सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे के बाद यह लगभग स्पष्ट माना जा रहा है कि चुनाव फिलहाल टल सकते हैं। सरकार ने अदालत को बताया है कि वह एक समर्पित पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग का गठन करेगी और उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत सीटों का आरक्षण तय किया जाएगा। इसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
मामला कोर्ट तक कैसे पहुंचा
हाई कोर्ट में दायर याचिका में मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वर्तमान आयोग को स्थानीय निकाय चुनावों के लिए आरक्षण तय करने का वैधानिक अधिकार नहीं है। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ के समक्ष सरकार ने स्पष्ट किया कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नया समर्पित आयोग गठित करेगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश क्या कहते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए ट्रिपल टेस्ट की व्यवस्था अनिवार्य की है।
1- समर्पित आयोग का गठन
2- ओबीसी की वास्तविक आबादी का समकालीन सर्वे (रैपिड सर्वे)
3- कुल आरक्षण 50% की सीमा के भीतर रहे।
इन्हीं निर्देशों के तहत नया आयोग तीन साल के कार्यकाल के साथ गठित किया जाएगा। मौजूदा ओबीसी आयोग का मूल कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका है, भले ही सरकार ने उसे अक्टूबर 2026 तक बढ़ाया हो, लेकिन कानूनी रूप से उसे समर्पित आयोग का दर्जा नहीं मिला था, जिस पर सवाल उठे।
अब आगे क्या प्रक्रिया होगी?
1- नए समर्पित आयोग का गठन करने के लिए सरकार अधिसूचना जारी कर आयोग बनाएगी।
2- रैपिड सर्वे: आयोग प्रदेश भर में ओबीसी वर्ग की वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का आकलन करेगा।
3- डेटा विश्लेषण और रिपोर्ट: सर्वे के आधार पर यह तय होगा कि पंचायतों में ओबीसी आरक्षण कितने प्रतिशत और किन सीटों पर लागू होगा।
4- राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना: आयोग की अंतिम रिपोर्ट के बाद आरक्षण संबंधी अधिसूचना जारी होगी।
5- चुनाव आयोग द्वारा कार्यक्रम घोषित होगा, तभी पंचायत चुनाव की तारीखों का एलान संभव होगा।
खुलकर पार्टी कार्यकर्ता और राजनीतिक दल भले ही इस मामले पर खुलकर न बोल रहे हों, लेकिन उनका मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में समय लगना तय है, इसलिए अप्रैल-मई में प्रस्तावित चुनाव का समय पर होना मुश्किल माना जा रहा है।
– उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत सीटों का आरक्षण तय होगा
कार्यकाल पूरा होने पर क्या होगा
प्रदेश में ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य का कार्यकाल मई के पहले सप्ताह में समाप्त हो रहा है। वहीं, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल जुलाई के पहले सप्ताह में खत्म होगा। यदि तब तक चुनाव नहीं होते हैं, तो सरकार संबंधित पदों पर प्रशासक (रिसीवर) नियुक्त कर सकती है, जो नए चुनाव तक कार्यभार संभालेंगे।
राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव कराने को लेकर सतर्क है। पार्टी के भीतर यह आशंका जताई जा रही है कि पंचायत चुनाव में प्रधान से लेकर जिला पंचायत स्तर तक टिकट और समर्थन को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में आपसी टकराव बढ़ सकता है।
मानी जा रही ये रणनीति
पंचायत चुनाव आमतौर पर दलगत आधार पर नहीं लड़े जाते, लेकिन जमीनी स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण स्पष्ट रहता है। ऐसे में यदि पार्टी किसी एक प्रत्याशी का समर्थन करती है तो दूसरे गुट की नाराजगी विधानसभा चुनाव में नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए यह रणनीति मानी जा रही है कि पहले विधानसभा चुनाव हो जाएं, उसके बाद पंचायत चुनाव कराए जाएं, ताकि आंतरिक असंतोष का असर बड़े चुनाव पर न पड़े।
जानें क्या बोले राजनीतिक जानकार
राजनीतिक जानकार अमित शुक्ला ने बताया कि यूपी पंचायत चुनाव 2026 अब सीधे तौर पर समर्पित ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर हो गए हैं। कानूनी प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और राजनीतिक गणित इन तीनों के बीच चुनाव की टाइमिंग तय होगी। फिलहाल संकेत यही हैं कि चुनाव टल सकते हैं और पहले आरक्षण का पूरा कानूनी ढांचा मजबूत किया जाएगा। आने वाले महीनों में आयोग के गठन और सर्वे की रफ्तार ही तय करेगी कि पंचायत चुनाव कब होंगे।
























