ब्लिट्ज ब्यूरो
नई दिल्ली। वैश्विक चुनौतियों, महंगे कच्चे तेल और रुपये पर दबाव के बीच अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए आरबीआई ने अपनी बैलेंस शीट की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 1.09 लाख करोड़ रुपये जोखिम प्रावधान में रखने का फैसला किया है। यह 2024-25 के 44,900 करोड़ रुपये से दोगुना से भी अधिक है।
रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण के साथ जोखिम बफर में इतनी बड़ी वृद्धि बताती है कि केंद्रीय बैंक वैश्विक और घरेलू जोखिमों को हल्के में नहीं ले रहा है।
आरबीआई ने विगत दिवस 2025-26 के लिए सरकार को 2.87 लाख करोड़ का रिकॉर्ड अधिशेष देने का फैसला किया। यह सरकार के राजस्व के लिए बड़ी राहत है, लेकिन बोर्ड के फैसले में अहम संकेत जोखिम बफर से आया। केंद्रीय बैंक ने कंटिंजेंट रिस्क बफर को बैलेंस शीट के 6.5 फीसदी पर बनाए रखा है। पिछले वर्ष यह 7.5 फीसदी था, लेकिन बैलेंस शीट का आकार 20.6 फीसदी बढ़कर 91.97 लाख करोड़ हो जाने से जोखिम प्रावधान की राशि तेज बढ़ी है।
सुरक्षा दीवार को भी दी मजबूती
जोखिम बफर आरबीआई के लिए वित्तीय झटकों से बचाव का साधन है। केंद्रीय बैंक के पास विदेशी मुद्रा संपत्तियां, सरकारी प्रतिभूतियां और सोना जैसी बड़ी होल्डिंग होती हैं। डॉलर-रुपया विनिमय दर, बॉन्ड यील्ड, सोने के भाव और वैश्विक वित्तीय बाजारों में तेज उत्तार-चढ़ाव से उसकी बैलेंस शीट प्रभावित हो सकती है। ईरान तनाव, तेल की ऊंची कीमतें और मुद्रा बाजार में अस्थिरता ऐसे जोखिमों को और बढ़ा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में आरबीआई ने अधिशेष देने के साथ अपनी सुरक्षा दीवार भी मजबूत की है।
आय में भी मजबूत वृद्धि
आरबीआई की आय में भी मजबूत वृद्धि दिखी है। 2025-26 में उसकी सकल आय 26.4 फीसदी बढ़ी, जबकि खर्च और जोखिम प्रावधान से पहले व्यय 27.6% बढ़ा। इसके बावजूद शुद्ध आय पिछले वर्ष के 3.13 लाख करोड़ से बढ़कर 3.96 लाख करोड़ रही। सोने में तेज उछाल और विदेशी संपत्तियों के पुनर्मूल्यांकन से बैलेंस शीट का आकार बढ़ा। हालांकि, सोने की वास्तविक होल्डिंग में बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
ऐसे कमाता है केंद्रीय बैंक
आरबीआई की कमाई मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार पर ब्याज, अमेरिकी बॉन्ड एवं अन्य विदेशी प्रतिभूतियों से आय, सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज, रुपये-डॉलर लेनदेन से लाभ और बैंकों को दी जाने वाली तरलता सुविधा से होती है।













