मेघना अंगरिश
मुंबई। बांग्लादेश में स्कूलों में संगीत शिक्षा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष का रूप लेता दिख रहा है। बाउल साधकों, कलाकारों और स्वतंत्र विचारों पर बढ़ते दबाव ने अभिव्यक्ति की आजादी और सांस्कृतिक विरासत को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में सरकार ने बच्चों के समग्र विकास के लिए स्कूलों में संगीत शिक्षकों की नियुक्ति की योजना बनाई, लेकिन जमात से जुड़े धार्मिक संगठनों के विरोध के बाद बिना सार्वजनिक बहस के इसे वापस ले लिया गया।
इसके बाद विरोध की दूसरी लहर उठी। बाउल साधक, छात्र और स्वतंत्र सोच वाले लोग सड़कों पर उतर आए। ढाका की यूनिवर्सिटीज से लेकर गांव-शहर तक प्रदर्शन हुए और बाउल साधकों पर हमले व दमन की घटनाएं बढ़ीं। कई लोग इसे अफगानिस्तान में तालिबान के बाद कला और शिक्षा पर लगे प्रतिबंधों से जोड़कर देख रहे हैं।
बाउल को अक्सर घूम-घूमकर गाने वाला कलाकार समझ लिया जाता है, जबकि वे केवल संगीतकार नहीं हैं। उनका जीवन दर्शन आत्म-खोज और समाज की समझ से जुड़ा है, जहां गीत साधन है, लक्ष्य नहीं।
इस दमन पर वरिष्ठ बाउल साधक और लेखक अब्देल मन्नान कहते हैं कि यह नया नहीं है। अंग्रेजों के दौर से ही बाउल-फकीरों पर अत्याचार होते रहे हैं। 18वीं सदी में यही दमन संन्यासी विद्रोह का कारण बना, जिसका उल्लेख बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनंदमठ’ में किया है, जहां हिंदू बाउल और मुस्लिम फकीर साथ लड़ते हैं।
मन्नान के अनुसार, लालन फकीर से पहले भी ऐसे दौर आए। अंग्रेजों ने कट्टर ताकतों के जरिए फकीरों को दबाया—हत्याएं हुईं ं, गांव जलाए गए। आजादी के बाद भी हालात नहीं बदले। बीएनपी, शेख हसीना और वर्तमान दौर—हर समय बाउल हमलों का शिकार रहे। अब कट्टरपंथी ताकतों को खुली छूट मिलती दिख रही है।
स्थिति तब और गंभीर हुई जब मशहूर बाउल गायक अब्दुल सरकार को मदारीपुर में कार्यक्रम के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर दंगा फैलाने और धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे। यह कार्रवाई एक स्थानीय इमाम की शिकायत पर हुई, जिसे कई लोग अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला मानते हैं। बांग्लादेश में लेखक और फिल्मकार भी कट्टरता के शिकार रहे हैं। लेखिका तस्लीमा नसरीन आज भी निर्वासन में हैं। उनका कहना है कि राजनीति में धर्म के इस्तेमाल और आलोचना के कारण उन्हें देश छोड़ना पड़ा। उनके अनुसार, कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देने की नीति का असर अब साफ दिख रहा है। जमात-ए-इस्लामी और हिफाजत-ए-इस्लाम के दबाव में स्कूलों में संगीत और शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की भर्ती योजना रद्द कर दी गई। विरोध के दौरान ‘तौहिदी जनता’ के नाम से जुटी भीड़ ने बाउल गायकों पर हमले किए। आशंका है कि इसका असर आगे थिएटर, खेल और फिल्म जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।
बाउल परंपरा बंगाल की साझा विरासत है। लालन फकीर और अब्बास अहमद जैसी हस्तियों ने धर्म से ऊपर उठकर मानवता और प्रेम की बात की। इसमें हिंदू वैष्णव और सूफी इस्लाम का संगम दिखाई देता है। हिंदू साधक ‘बाउल’ और मुस्लिम साधक ‘फकीर’ कहलाते हैं, लेकिन उनकी तलाश एक ही है।
कुश्तिया के चेउरिया गांव में लालन फकीर का अखाड़ा और पश्चिम बंगाल के बोलपुर में जयदेव बाउल मेला इस परंपरा के प्रमुख केंद्र हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। आधुनिक दौर में पूर्ण दास बाउल, पार्वती बाउल और पाबना दास बाउल जैसे कलाकारों ने इस परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाई। ‘खयापा बैंड’ और ‘बोलपुर ब्लूज’ ने इसे आधुनिक संगीत से जोड़ा, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
आज सवाल केवल संगीत का नहीं, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता का है। बाउल कहते हैं—एकतारे पर ज्यादा दबाव पड़ेगा तो उसका तार टूट जाएगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि तमाम दमन के बावजूद यह परंपरा जीवित रही है और आगे भी रहेगी। इसी विश्वास के साथ बाउल आज भी कहते हैं—जय गुरु!













