ब्लिट्ज ब्यूरो
जितेंद्र सिंह, केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्यमंत्री कल्पना करें, राजस्थान के दूरदराज में जिलाधिकारी को ऐसी महत्वाकांक्षी कल्याण योजना की जिम्मेदारी सौंपी जाती, जिसके बारे में उसकी जानकारी बहुत कम है, तो वह क्या करता? एक दशक पहले तक उसे जानकारी के लिए धूल फांक रही किसी नियमावली का सहारा लेना होता या अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी के खाली होने का इंतजार करना पड़ता। आज वह अपने फोन से ‘आई-गॉट’ यानी ‘इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म पर लॉग ऑन करता है और मिनटों में उसे अपनी जरूरत के अनुरूप एक सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम मिल जाता है। शाम तक वह सूचनाओं व आत्मविश्वास से लैस होकर योजना के लाभार्थियों की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहा होता है।
यह बदलाव देखने में छोटा लग सकता है, मगर हकीकत में किसी क्रांति से कम नहीं। पांच साल पहले शुरू किया गया ‘मिशन कर्मयोगी’ यह क्रांति ला रहा है। यह नए भारत के लिए नई तरह के प्रशासनिक अधिकारी तैयार करने के उद्देश्य से चुपचाप काम कर रहा है। इसके महत्व को समझने के लिए पहले हमें संदर्भ को जानना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के निर्धारित लक्ष्य तक यूं ही नहीं पहुंचा जा सकता। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें अपने गणतंत्र को चलाने वाली संस्थाओं व व्यक्तियों के जरिये सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा। इस यात्रा में सबसे ज्यादा अहमियत उन लगभग 3.5 करोड़ प्रशिक्षित, उत्साही व नागरिक केंद्रित सरकारी कर्मियों की क्षमता की है, जो भारतीय शासन को संचालित करते हैं।
पहले किसी नौजवान अधिकारी को सेवा की शुरुआत में औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था, फिर करियर के बीच में यदा-कदा उसे कुछ पाठ्यक्रमों में हिस्सा लेने का अवसर मिलता था। बाकी, उसे काम करते हुए और दूसरों को देखकर ही सीखना होता था। धीमी गति से बढ़ते विश्व में तो वह ठीक था, लेकिन एआई, जलवायु अवरोध, जनसांख्यिकीय दबाव व जबर्दस्त प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के युग में यह नाकाफी है। मिशन कर्मयोगी को इसी स्थिति के समाधान के तौर पर शुरू किया गया। 2021 से शुरू हुए मिशन के कारण हमारे कर्मचारी नियमों का पालन करने वाले एक पदाधिकारी से ‘कर्मयोगी’ बनने की ओर अग्रसर हैं, यानी एक ऐसा लोक सेवक बनने की ओर, जो किसी उद्देश्य, सेवा-भाव और उत्कृष्टता से प्रेरित हो।
पिछले पांच वर्षों के बाद इसके आंकड़े अत्यंत प्रेरित करने वाले हैं। ‘आई-गॉट’ प्लेटफॉर्म से अब 1.5 करोड़ से अधिक सरकारी अधिकारी सक्रिय शिक्षार्थी के रूप में जुड़े हुए हैं। यह एक ऐसी संख्या है, जो शुरू में काल्पनिक लगती थी। 4,600 से अधिक योग्यता-आधारित पाठ्यक्रमों के जरिये इन अधिकारियों ने 8.3 करोड़ से अधिक पाठ्यक्रम पूरे किए हैं। यानी छत्तीसगढ़ में नियुक्त राजस्व निरीक्षक, पुणे में तैनात शहरी निकाय अधिकारी, मणिपुर में कार्यरत स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ये सब अपने साथी नागरिकों की बेहतर सेवा करने के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रहे हैं।
साधना सप्ताह (राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह) इस पांच वर्षीय यात्रा का उत्सव व इसके अधूरे कार्यों के प्रति पुनर्संकल्प, दोनों है। एक राष्ट्रीय सम्मेलन के साथ हम इस सप्ताह का आरंभ कर रहे हैं, जिसमें लगभग 700 वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और 3,000 से अधिक आभासी माध्यम से शामिल हो रहे हैं। इसके जरिये हम अगले पांच वर्षों के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं, जिसमें हरेक स्तर पर प्रत्येक सिविल सेवक निरंतर सीखने वाला, एक नागरिक चैंपियन और देश की आकांक्षाओं का आत्मविश्वासी संरक्षक होगा।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य केवल नीतियों से पूरे नहीं होंगे, वे लोगों के माध्यम से हासिल होंगे- उस जिला अधिकारी द्वारा, जो योजनाओं को सही ढंग से समझकर लागू कर सके, उस शहरी योजनाकार द्वारा, जो स्थानीय डाटा का सार्थक उपयोग कर सके, उस अग्रिम स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनियों को इस तरह संप्रेषित करे कि उसका समुदाय उस पर भरोसा करे। मिशन कर्मयोगी न केवल कल के लिए, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उसी दल का निर्माण कर रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
साभार हिंदुस्तान













